नई रिपोर्ट भारत के 11000 किलोमीटर लम्बे तटीय क्षेत्र पर मंडराते जलवायु संकट की चेतावनी देती है

मुंबई, महाराष्ट्र, भारत

भारत के तटीय क्षेत्रों पर जलवायु परिवर्तन का संकट मंडरा रहा है। अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी द्वारा रिलीज की गई रिपोर्ट इंडियन कोस्टल रीजन : क्लाइमेट प्रोजेक्शन 2021-2040 के अनुसार यह संकट अगले कुछ सालों में जिंदगियों, रोजगार की स्थितियों और पारिस्थितिक तंत्र को बदल देगा।

संतोनु गोस्वामी, प्रोफेसर, स्कूल ऑफ़ क्लाइमेट चेंज एंड सस्टेनेबिलिटी, अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय, बेंगलुरु

निकट भविष्य (2021-2040) की संभावनाओं पर ध्यान देते हुए यह अध्ययन नीति-निर्माताओं और स्थानीय समुदायों के लिए व्यावहारिक अंतर्दृष्टियां प्रदान करता है। इस अध्ययन के लिए CMIP6* मॉडल का इस्तेमाल किया गया है, जिसे क्षेत्रीय स्तर की सटीकता बढ़ाने के लिए संतुलित किया गया है। यह रिपोर्ट आगाह करती है कि अनुकूलन का समय बड़ी तेजी से घटता जा रहा है क्योंकि भारत के सभी प्रशासनिक क्षेत्रों में जल्दी ही 1.5 डिग्री सेल्सियस की वार्मिंग सीमा को छूने का खतरा पैदा हो चुका है।

अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन के सीईओ अनुराग बेहार ने कहा कि, “जलवायु परिवर्तन कोई सुदूर भविष्य की चुनौती नहीं है, यह आज की सच्चाई है। 2040 महज 14 साल दूर है। ये आंकड़े जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को उसकी तात्कालिकता के साथ सामने रखते हैं और इस समस्या से सामूहिक तौर पर निपटने के लिए अपने बुनियादी ढांचे और प्रशासनिक तंत्र में बदलाव की जरूरत को रेखांकित करते हैं।

रिपोर्ट इस बात की पहचान करती है कि केरल में वेट-बल्ब टेम्परेचर के बढ़ने से लेकर महाराष्ट्र में मानसून के बढ़ने जैसे परिवर्तन नाकइ विंड कैलेण्डर जैसी पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों को पहले ही अविश्वसनीय बना रहे हैं। इस रिपोर्ट का लक्ष्य जिला-स्तर पर सुरक्षात्मक उपायों की तैयारी के लिए स्थानीय प्रशासन को जरूरी बुनियादी आंकड़े मुहैया कराना है।

अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ़ क्लाइमेट चेंज एंड सस्टेनेबिलिटी की डायरेक्टर हरिनी नगेन्द्र ने कहा कि “इस रिपोर्ट के आंकड़े एक ऐसी सच्चाई बयान कर रहे हैं, जिसे नजरंदाज करने का जोखिम हम नहीं उठा सकते। जलवायु परिवर्तन को दशकों से हमने कहीं दूर मौजूद वैश्विक समस्या के रूप में देखा है, ध्रुवीय बर्फीली चोटियों से जुड़ी ऐसी समस्या के रूप में जिसके गहराने में अभी सदियों का समय बाकी हैं। लेकिन हमारे निष्कर्ष बताते हैं कि भारतीय तटीय क्षेत्र के मामले में संकट बहुत स्थानीय और बहुत करीब है। बात चाहे एर्नाकुलम में बढ़ती गर्मी की हो, चाहे सुंदरबन में बढ़ते खारेपन की, जलवायु परिवर्तन का प्रभाव हमारी जिंदगी के हर पहलू पर दिख रहा है। हालात बिगड़ने के बाद सिर्फ़ नुकसान कम करने की कोशिश से आगे बढ़कर अब हमें पहले से तैयारी करने और खुद को ढालने की दिशा में काम करना होगा। इसके लिए हमारे पास बहुत कम समय है। हमें एक ऐसा भविष्य बनाना है जो हमारे राष्ट्र के सामने आने वाली पारिस्थितिक चुनौतियों को स्वीकार करता हो।’’

महाराष्ट्र और गुजरात के तटीय इलाके एक महत्वपूर्ण पर्यावरणीय संक्रमण के दौर में प्रवेश कर रहे हैं। इससे मुंबई उपनगर के गर्मियों के समय के अधिकतम तापमान में 1.3 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोत्तरी होने का अनुमान है। यह गर्मी से बचने की योजनाओं की बढ़ती जरूरत पर जोर देता है। इस गर्मी के साथ-साथ मौसमी बरसात में भी स्पष्ट तीव्रता दिखती है। मुंबई उपनगर में लगभग एक अतिरिक्त हफ्ते (+6 दिन) तक तेज बारिश की उम्मीद है। जबकि सूरत और भावनगर में दक्षिण-पश्चिमी मानसून के प्रभाव में क्रमशः 23% और 24% बढ़ोत्तरी की संभावना है। इन बदलावों के कारण स्थानीय आजीविका पहले से ही प्रभावित हो रही है। उदाहरण के लिए मुंबई में कोली समुदाय का कहना है कि अनपेक्षित बारिश से झींगों को सुखाने के पारंपरिक पेशे को नुकसान हो रहा है। 2040 की स्थितियों पर ध्यान देते हुए यह रिपोर्ट ऐसे विस्तृत आंकड़े सामने लाती है जो पश्चिमी तट के बुनियादी ढांचों और उसकी अनोखी तटीय विरासत की सुरक्षा के लिए जरूरी हैं।

मुख्य निष्कर्ष

  • बढ़ता तापमान : भारत के औसत तापमान में 1.5 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोत्तरी होने का अनुमान है। लगभग 40 तटीय इलाकों में गर्मियों के मौसम के तापमान में 1 डिग्री सेल्सियस वृद्धि की संभावना है।
  •  “वेट-बल्ब” का खतरनाक स्तर : तटीय केरल और तमिलनाडु ग्रीष्मकालीन वेट-बल्ब तापमान के उच्च स्तर का सामना करेंगे। 31 डिग्री सेल्सियस का स्तर इंसानों के लिए खतरनाक माना गया है।
  • एर्नाकुलम की गर्मी में उछाल : सभी तटीय इलाकों की बात करें तो गर्मी के मौसम के अधिकतम तापमान में सबसे ज्‍यादा वृद्धि एर्नाकुलम में होने का अनुमान है। संभावित वृद्धि 1.3 डिग्री सेल्सियस है।
  • पश्चिमी तट का प्रचंड मानसून : तटीय महाराष्ट्र और गुजरात ज्यादा बारिश का सामना करेंगे। मुंबई उपनगर में लगभग एक अतिरिक्त हफ्ते तक तेज बारिश होने की सम्भावना है।
  • सूरत के मानसून में बढ़ोत्तरी : ऐतिहासिक स्तरों की तुलना में सूरत के दक्षिण-पश्चिमी मानसून में 23% की बढ़ोत्तरी का अनुमान है।
  • समुद्री स्तर का बढ़ना और कटाव की समस्या : संयमित उत्सर्जन की स्थिति (SSP2-4.5)** में 2050 तक वैश्विक समुद्री स्तर में 15 सेंटीमीटर की बढ़ोत्तरी का अनुमान है, जिससे तटीय कटाव बढ़ेगा और ओड़िशा के गंजाम जैसे क्षेत्रों में “वीरान गांव” बन सकते हैं।
  • साइक्लोन का खतरा : समुद्री सतह के तापमान में रफ़्तार से होती वृद्धि (0.27 डिग्री सेल्सियस प्रति दशक) प्रचंड ट्रॉपिकल साइक्लोन की संभावना को बढ़ा रही है।
  • पारंपरिक आजीविका पर प्रभाव : गोवा में बेमौसम बारिश कुछ ही घंटों में तैयार किया हुआ पूरा नमक ख़राब कर दे रही है। गर्म होते समुद्र के कारण मछलियाँ किनारों से दूर जा रही हैं, जिससे छोटी नावों वाले मछुआरों को खाली हाथ लौटना पड़ रहा है।
  • स्वास्थ्य और खारापन : सुंदरबन में बार-बार तटबंधों के टूटने से बढ़ता खारापन त्वचा रोग और महिलाओं में माहवारी से जुड़ी समस्याओं को बढ़ा रहा है।

अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी के बारे में

अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी, बेंगलुरु की स्थापना कर्नाटक सरकार के अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी एक्ट 2010 के तहत हुई थी। अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी, भोपाल की स्थापना मध्य प्रदेश के निजी विश्वविद्यालय (स्थापना एवं संचालन) द्वितीय संशोधन अधिनियम, 2022 के प्रावधान के तहत हुई थी। रांची में अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी की स्थापना झारखण्ड सरकार द्वारा लागू अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी एक्ट, 2022 के तहत हो रही है।

अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन ने इन तीनों विश्वविद्यालयों को पूरी तरह परोपकारी संस्थाओं के रूप में बनाया किया है। इन संस्थाओं का स्पष्ट सामाजिक उद्देश्य न्यायपूर्ण, निष्पक्ष, मानवीय और टिकाऊ समाज बनाने में योगदान करना है।

संपादकों के लिए नोट

*CMIP6 (क्लाइमेट मॉडलिंग) जलवायु पूर्वानुमान की नवीनतम वैश्विक प्रणाली है। बहुत सटीक पूर्वानुमान के लिए इसमें 30 अंतरराष्ट्रीय प्रयोगशालाओं के डेटा का एक साथ इस्तेमाल किया जाता है। यह वैज्ञानिकों को किसी विशेष क्षेत्र का बारीकी से अध्‍ययन करने का पहले की तुलना में ज्यादा मौका देता है।

**SSP2-4.5 “मध्यमार्ग” की स्थति है। यह दुनिया के वर्तमान विकास पथ के आधार पर जलवायु का अनुमान लगाता है। यहाँ इसे एक वास्तविक सन्दर्भ बिंदु के रूप में इस्तेमाल किया गया है। यह बताता है कि अगर वैश्विक विकास और कार्बन उत्सर्जन बिना किसी बड़े बदलाव के मौजूदा रफ़्तार से चलता रहे तो भारत के तटीय क्षेत्रों को तत्काल कितना खतरा है।

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